जीवन
दिमित्रिस रोंतिरिस, जिनका नाम Rondiris भी लिखा जाता है, 1899 में जन्मे। स्रोत उनका जन्मस्थान या तो पोरोस या पिरेयस बताते हैं, पर वे पिरेयस में पले-बढ़े और जीवन भर इस बंदरगाह नगर से गहराई से जुड़े रहे। वे रंगमंच की ओर मुड़े और बाद में पढ़ाई के लिए विदेश गए, जहाँ उन्होंने निर्देशक माक्स राइनहार्ट के साथ काम किया और उनके सहायक बने; इस अनुभव ने बड़े, सावधानी से अभ्यास कराए गए समूहों के प्रति उनकी रुचि को आकार दिया।
1930 के दशक की शुरुआत में वे एथेंस के नवस्थापित शाही रंगमंच, आज के यूनान के राष्ट्रीय रंगमंच, में निर्देशक और नाट्य विद्यालय के शिक्षक के रूप में जुड़े। 1934 में फ़ोतोस पोलितिस की मृत्यु के बाद वे उसके मुख्य निर्देशक बने; यह पद उन्होंने 1942 तक और फिर 1946 से 1950 तक संभाला। 1939 में वे मंडली को हैमलेट और एलेक्ट्रा के साथ लंदन ले गए। 1957 में उन्होंने पिरेयस नगरपालिका के सहयोग से पिरेयस थिएटर (Πειραϊκό Θέατρο) की स्थापना की। इस मंडली के साथ उन्होंने यूनान के प्राचीन रंगमंचों में और यूरोप, उत्तर व दक्षिण अमेरिका तथा एशिया के दौरों पर प्राचीन त्रासदी प्रस्तुत की; उदाहरण के लिए 1963 में मंडली बर्लिन उत्सव दिवसों में अतिथि रही। उनका अंतिम निर्देशन 1978 में सोफ़ोक्लीज़ की एलेक्ट्रा था, एपिडॉरस में उनकी पहली एलेक्ट्रा के चालीस वर्ष बाद। 20 दिसंबर 1981 को एथेंस में उनका निधन हुआ।
कृतियाँ
रोंतिरिस ने शेक्सपियर सहित विस्तृत प्रदर्शन-सूची का निर्देशन किया: शाही रंगमंच में उनके 1937 के हैमलेट में शीर्षक भूमिका अलेक्सिस मिनोतिस ने निभाई, साथ में कातिना पाक्सिनू और एमिलियोस वेआकिस थे। फिर भी उनका निर्णायक काम प्राचीन त्रासदी में था। सितंबर 1938 में उन्होंने सोफ़ोक्लीज़ की Ηλέκτρα (एलेक्ट्रा) एपिडॉरस में मंचित की, जो उस रंगमंच में प्राचीन नाटक का पहला आधुनिक मंचन था। यह देर दोपहर, बिना दृश्यसज्जा और बिना बिजली की रोशनी के, लगभग 3,500 दर्शकों के सामने शुरू हुआ। पाक्सिनू ने एलेक्ट्रा, एलेनी पापादाकी ने क्लाइटेमनेस्ट्रा और थानोस कोत्सोपुलोस ने ओरेस्टीज़ की भूमिका निभाई, और एक समीक्षक ने कोरस की साठ महिलाओं की एक-साथ गति की प्रशंसा की।
1949 में हेरोडीज़ एटिकस के ओडियन में उनकी Ορέστεια (ओरेस्टिया) में मारिका कोतोपुली ने क्लाइटेमनेस्ट्रा की भूमिका निभाई, और 1954 में एपिडॉरस में उनका Ιππόλυτος (हिप्पोलिटस) नए स्थापित उत्सव का मील का पत्थर बना। कोरस उनकी पद्धति के केंद्र में था: बड़ा, लयबद्ध और कठोर अनुशासन वाला, जिसकी नृत्य-रचना अधिकतर लूकिया साकेलारियू ने की। एक साक्षात्कार में उन्होंने समझाया कि एलेक्ट्रा का एक अंतराल-दृश्य यूनानी नृत्य सिर्तोस के क़दमों पर आधारित था, जिन्हें नाटक के अनुरूप ढाला गया था। आलोचक इस सटीकता की प्रशंसा करते थे पर कभी-कभी इसे ठंडा पाते थे, और कुछ को लगता था कि कोरस और अभिनेता पूरी तरह एक नहीं थे। पिरेयस थिएटर में आस्पासिया पापाथानासियू उनकी एलेक्ट्रा बनीं, ऐसी प्रस्तुतियों में जो विदेश गईं, जिनमें 1961 में लंदन भी शामिल था।
आज के यूनान में विरासत
विद्वान रोंतिरिस को प्राचीन त्रासदी के मंचन में राष्ट्रीय रंगमंच की परंपरा का संस्थापक मानते हैं, जिसे बाद में अलेक्सिस मिनोतिस और ताकिस मूज़ेनिदिस ने आगे बढ़ाया। पिरेयस में उन्हें नगर के अपने प्राचीन नाटक-गुरु के रूप में याद किया जाता है: 2016 में उनकी बेटी ने उनका अभिलेखागार पिरेयस नगरपालिका को दान किया और 2017 में पिरेयस नगर रंगमंच के मुख्य मंच का नाम उनके नाम पर रखा गया। राष्ट्रीय रंगमंच का डिजिटल अभिलेखागार उनकी प्रस्तुतियों के कार्यक्रम, तस्वीरें और समीक्षाएँ सँजोए हुए है। आज़माइए: वहाँ उनकी किसी एलेक्ट्रा की एक तस्वीर खोजिए और कोरस का वर्णन दो यूनानी वाक्यों में कीजिए, एक में कि वह क्या करता है और दूसरे में कैसे, जैसे Ο χορός προχωρά αργά προς το κέντρο (कोरस धीरे-धीरे केंद्र की ओर बढ़ता है)। फिर अपने वाक्यों की तुलना सिर्तोस के क़दमों पर उनकी अपनी व्याख्या से कीजिए।
क्या आप जानते हैं?
- 1938 की एपिडॉरस एलेक्ट्रा दिन के उजाले में, देर दोपहर से खेली गई, क्योंकि वहाँ बिजली नहीं थी।
- वे बर्लिन के अग्रणी निर्देशकों में से एक माक्स राइनहार्ट के सहायक रहे।
- उनका पिरेयस थिएटर 1963 में बर्लिन उत्सव दिवसों में अतिथि रहा।
- पिरेयस नगर रंगमंच का मुख्य मंच 2017 से उनके नाम पर है।
प्रमुख कृतियाँ
| यूनानी शीर्षक | शीर्षक | वर्ष |
|---|---|---|
| Άμλετ | हैमलेट — शाही रंगमंच, एथेंस | 1937 |
| Ηλέκτρα | एलेक्ट्रा — एपिडॉरस | 1938 |
| Ορέστεια | ओरेस्टिया — हेरोडीज़ एटिकस का ओडियन | 1949 |
| Ιππόλυτος | हिप्पोलिटस — एपिडॉरस | 1954 |
| Πειραϊκό Θέατρο | पिरेयस थिएटर की स्थापना | 1957 |
| Ηλέκτρα | एलेक्ट्रा — उनका अंतिम निर्देशन | 1978 |
याद रखने लायक एक पंक्ति
Πρόκειται απλούστατα περί βηματισμών παρμένων απ’ το συρτό μας και προσαρμοσμένων στις απαιτήσεις του έργου.
Prókeitai aploústata perí vimatismón parménon ap’ to syrtó mas kai prosarmosménon stis apaitíseis tou érgou.
यह बस हमारे सिर्तोस से लिए गए और नाटक की माँगों के अनुसार ढाले गए क़दमों की बात है।


























































