जीवन
अलेक्सान्द्रा पापादोपूलू का जन्म 1867 में कॉन्स्टेंटिनोपल में हुआ; एक यूनानी संदर्भ-ग्रंथ 1876 बताता है, पर मृत्यु के समय उनकी आयु 1867 की ओर संकेत करती है। उन्होंने शहर के प्रसिद्ध पल्लास बालिका विद्यालय में पढ़ाई की और अध्यापिका बनीं। उन्होंने वहाँ पढ़ाया और निजी शिक्षिका के रूप में भी काम किया, जिनमें डॉक्टर फ़ोतिस फ़ोतियादिस के बच्चे भी थे; फ़ोतियादिस शिक्षा में बोलचाल की भाषा के प्रमुख समर्थक थे। 1887 में उन्होंने स्त्रियों का पंचांग Ημερολόγιον των Κυριών (‘महिलाओं का पंचांग’) प्रकाशित किया।
उनकी सार्वजनिक गतिविधियों ने शत्रुता भड़काई। 1893 में उन्होंने एक प्रगतिशील महिला संघ की स्थापना की, जिस पर कॉन्स्टेंटिनोपल के अख़बार Νεολόγος (‘नेओलोगोस’) ने कड़ा प्रहार किया। 1896 में उन्होंने कवि इओआन्निस ग्रिपारिस के साथ साहित्यिक पत्रिका Φιλολογική Ηχώ (‘साहित्यिक प्रतिध्वनि’) का सह-संपादन किया। 1899 में पैट्रिआर्केट की केंद्रीय शिक्षा समिति ने उन्हें अपने विद्यालयों में पढ़ाने से रोक दिया, और वे बुखारेस्ट चली गईं। वहाँ उन्होंने एवांगेलिस्मोस विद्यालय के बालिका विभाग में निःशुल्क पढ़ाया और यूनानी अख़बार Πατρίς (‘पात्रिस’) के लिए लिखा।
लगभग 1905 में वे थेस्सालोनिकी में एक व्यावहारिक बालिका विद्यालय की प्रधान बनीं; यह शहर तब भी ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। 8 मार्च 1906 को कॉन्स्टेंटिनोपल के बालिक्ली यूनानी अस्पताल में कैंसर से उनकी मृत्यु हुई; वे 39 वर्ष की थीं।
कृतियाँ

पापादोपूलू ने मुख्यतः कहानियाँ लिखीं, लगभग 140, जो Εστία (‘एस्तिया’), Παναθήναια (‘पानाथिनाइया’) और Πινακοθήκη (‘पिनाकोथिकी’) जैसी पत्रिकाओं में बिखरी हैं। उन्होंने कम से कम सात छद्मनामों का प्रयोग किया, जिनमें Βυζαντίς (बीज़ान्टिन स्त्री), Ανατολίτισσα (पूर्व की स्त्री) और Θρακοπούλα (थ्रेस की लड़की) शामिल हैं। उनका पहला संग्रह Δεσμίς διηγημάτων (‘कहानियों का गुच्छा’) 1889 में कॉन्स्टेंटिनोपल से युवा ग्रिगोरियोस ज़ेनोपुलोस की भूमिका के साथ छपा, जिन्होंने उनकी चमकती शैली, बुद्धिचातुर्य, कोमलता और व्यंग्य की प्रशंसा की। 1891 के एक और खंड में लघु उपन्यास Περιπέτειαι μιας διδασκαλίσσης (‘एक अध्यापिका के कारनामे’) था, जो उनके अपने अध्यापन-अनुभव पर आधारित है। लघु उपन्यास Ημερολόγιον της δεσποινίδος Λεσβίου (‘कुमारी लेसवियू की डायरी’) 1894 में आया और अपनी मनोवैज्ञानिक गहराई के लिए जाना जाता है।
उनकी अधिकांश कहानियाँ शहरी हैं: कॉन्स्टेंटिनोपल की मध्यवर्गीय और संपन्न यूनानी स्त्रियाँ, उनके परिवार, विवाह और सामाजिक महत्वाकांक्षाएँ। बाद में उन्होंने Στο μοναστήρι (‘मठ में’, 1902–1903) जैसी बीज़ान्टिन कहानियाँ भी लिखीं, जो नौवीं सदी के दरबारी षड्यंत्रों के बारे में हैं; आन्ना कोम्नेनी पर एक उपन्यास केवल पांडुलिपि में बचा था और अब खो चुका है। उनकी भाषा विद्वत्तापूर्ण कथारेवुसा और बोलचाल की भाषा के बीच चलती है। बोस्पोरस के किनारे थेरापिया में घटित Η γιαγιά (‘दादी’) में एक लगभग अंधी दादी सुई से लेस बनाकर पाँच नाती-पोतों को पालती है, और सबसे छोटा उपहार में उसके लिए आँखें माँगता है।
आज के यूनान में विरासत
दशकों तक पापादोपूलू लगभग भुला दी गई थीं। भाषाशास्त्री यान्निस पापाकोस्तास ने 1980 के एक अध्ययन में उनका जीवन फिर से संजोया और बाद में उनकी कहानियों का संपादन किया; 1987 से कई यूनानी प्रकाशकों ने उन्हें फिर से छापा है, और स्त्री-लेखन तथा शिक्षा के विद्वान आज उन्हें अग्रणी मानते हैं। उनकी कहानी Η γιαγιά (‘दादी’) यूनानी विकिस्रोत पर मुफ़्त पढ़ी जा सकती है। अंतिम दृश्य पढ़िए और पात्रों को नाम देने या संबोधित करने का हर तरीका लिखिए: η γιαγιά (दादी), το Γεωργάκι (नन्हा गियोर्गोस), η μανούλα (अम्मा), μάτια μου (मेरे लाल, शाब्दिक अर्थ ‘मेरी आँखें’)। ध्यान दीजिए कि कौन बोलता है और कौन चुप रहता है। फिर दो विद्वत्तापूर्ण वाक्यांशों को आज की यूनानी में लिखिए, जैसे διά να ιδή को για να δει (ताकि वह देख सके)।
क्या आप जानते हैं?
- 1896 में प्रकाशित संकलन Ελληνικά διηγήματα (‘यूनानी कहानियाँ’) के लेखकों में वे एकमात्र स्त्री थीं।
- उनका एक छद्मनाम Σατανίσκη (नन्ही शैतान) था।
- उनकी केवल एक तस्वीर ज्ञात है; वह 1907 के एक यूनानी पंचांग में छपी, उनकी मृत्यु के अगले वर्ष।
- बीज़ान्टिन राजकुमारी और इतिहासकार आन्ना कोम्नेनी पर लिखा उनका उपन्यास खो गया है।
प्रमुख कृतियाँ
| यूनानी शीर्षक | शीर्षक | वर्ष |
|---|---|---|
| Ημερολόγιον των Κυριών | महिलाओं का पंचांग — स्त्रियों का पंचांग | 1887 |
| Δεσμίς διηγημάτων | कहानियों का गुच्छा | 1889 |
| Περιπέτειαι μιας διδασκαλίσσης | एक अध्यापिका के कारनामे — लघु उपन्यास | 1891 |
| Ημερολόγιον της δεσποινίδος Λεσβίου | कुमारी लेसवियू की डायरी — लघु उपन्यास | 1894 |
| Φιλολογική Ηχώ | साहित्यिक प्रतिध्वनि — इओआन्निस ग्रिपारिस के साथ संपादित पत्रिका | 1896 |
| Στο μοναστήρι | मठ में — बीज़ान्टिन लघु उपन्यास | 1902–1903 |
याद रखने लायक एक पंक्ति
— Μάτια μου... μάτια μου... Πολλά χείλη το λένε χαϊδευτικά το μάτια μου, μα στης γιαγιάς τα χείλη έχουν άλλη σημασία.
— Mátia mou... mátia mou... Pollá chíli to léne chaïdeftiká to mátia mou, ma stis giagiás ta chíli échoun álli simasía.
“मेरी आँखें… मेरी आँखें…” बहुत-से होंठ ‘मेरी आँखें’ दुलार में कहते हैं, पर दादी के होंठों पर इन शब्दों का अर्थ कुछ और है।










































