जीवन
अल्कियोनी पापादाकी का जन्म पश्चिमी क्रीट में खानिया के ठीक बाहर नियो खोरियो (जिसे नियोखोरी भी लिखा जाता है) गाँव में हुआ; उनके प्रकाशकों की जीवनियाँ जन्म-वर्ष नहीं बतातीं। वे एक ऐसे घर में पलीं जिसे वे लाल घर कहती हैं और जिसने बाद में उनकी पहली किताब को उसका शीर्षक दिया। उनके पिता अल्बानिया के युद्ध में घायल हुए एक शिक्षक थे, और उनकी माँ तथा दादा-दादी भी शिक्षक थे। गृहयुद्ध के बाद के तनाव भरे वर्षों में, जब वे लगभग तीन साल की थीं, उनके माता-पिता और दादा-दादी को जेल भेज दिया गया, क्योंकि उनकी माँ का भाई वामपंथी छापामारों से जा मिला था। किशोरावस्था में उन्होंने खानिया के फ़्रांसीसी स्कूल सेंट जोसेफ़ के छात्रावास में रहने की ज़िद की, जहाँ उन्होंने निकोस कज़ान्त्ज़ाकिस को पढ़ा।
स्कूल के बाद वे एथेंस चली गईं। उन्होंने पांतियोन विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास की, पर वहाँ कभी पढ़ने नहीं गईं और पत्रकारिता के पाठ्यक्रम चुने। प्रकाशक ख्रिस्तोस लाम्ब्राकिस को लिखे एक साहसी पत्र से उन्हें निकोस काकाउनाकिस के अधीन अख़बार Τα Νέα (ता नेआ) में प्रशिक्षु का काम मिला। जब आलोचक तासोस वूर्नास ने उनकी पांडुलिपि Το κόκκινο σπίτι (लाल घर) की समीक्षा लिखी, तो अख़बार Αυγή (अव्यी) ने उन्हें रिपोर्टर रख लिया।
उन्होंने वहाँ 1967 की तानाशाही तक काम किया, फिर कुछ समय पेरिस में रहीं; एक पुलिस फ़ाइल के कारण बाद में उन्हें पासपोर्ट देने से मना कर दिया गया। पैंतालीस की उम्र के आसपास से वे लगभग हर दो साल में एक उपन्यास प्रकाशित करती हैं, पहले कालेन्दिस से और 2018 से दिओप्त्रा से।
कृतियाँ

पापादाकी ने Το κόκκινο σπίτι (लाल घर) लगभग उन्नीस साल की उम्र में लिखी और उसकी पहली छपाई का ख़र्च ख़ुद उठाया; यह किताब खुले तौर पर आत्मकथात्मक है और उनके बचपन के क्रीटी घर से प्रेरणा लेती है। उनके प्रकाशक की सूची कालेन्दिस संस्करण को 1988 का बताती है, जिसके बाद Η μπόρα (मूसलाधार, 1989) आई। उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास Το χρώμα του φεγγαριού (चाँद का रंग) 1990 के दशक की शुरुआत में आया; सूचियाँ 1991 या 1995 बताती हैं। यह एक द्वीप के युवक फ़ोतिस और एथेंस की लड़की मारूसो की कहानी है, जिनका प्रेम सच्चा है पर उसके शहर आ जाने के बाद घातक बन जाता है। इसके कई बार नए संस्करण निकले हैं, सबसे हाल में दियोप्त्रा प्रकाशन से।
बाद के उपन्यासों में Οι κάργιες (कौवे, 1997), Θα ξανάρθουν τα χελιδόνια (अबाबीलें लौटेंगी, 2015) और Το χαμόγελο του δράκου (ड्रैगन की मुस्कान, 2018) शामिल हैं; अंतिम माँ और बेटी के अंतहीन संघर्ष और प्रेम में विश्वासघात पर एक गीतात्मक उपन्यास है। 2004 की Το τετράδιο της Αλκυόνης (अल्कियोनी की कॉपी) और Ξεφυλλίζοντας τη σιωπή (मौन के पन्ने पलटते हुए) में उनका गद्य कविता के सबसे क़रीब पहुँचता है।
उनकी शैली निजी और आत्मस्वीकृति भरी है। वे हाथ से लिखती हैं और कहती हैं कि कहानी शुरू होने से पहले उन्हें अपने पात्रों का अच्छी तरह अध्ययन करना पड़ता है। उन्हें συγγραφέας (लेखक) शब्द बहुत भारी लगता है: वे ख़ुद को λογοτέχνης (साहित्य-कलाकार) और साहित्य की कारीगरिन कहती हैं।
आज के यूनान में विरासत
पापादाकी यूनानी कथा-साहित्य के लोकप्रिय पक्ष से जुड़ी हैं: उनके उपन्यास लगातार बिकते हैं और हस्ताक्षर-सत्रों में कतारें लगती हैं। Τα Νέα में आलोचक मिकेला खार्तूलारी ने उन्हें पाठक की "नन्ही सहेली" कहा, और मानोलिस पिम्ब्लिस ने लिखा कि पाठक धैर्य से उनके हस्ताक्षर की प्रतीक्षा करते हैं। 2020 के दशक की शुरुआत में दिओप्त्रा ने उनकी बारह किताबें नए चित्रित आवरणों के साथ फिर से छापीं, इसलिए 1990 के दशक की किताबें यूनानी किताबों की दुकानों में फिर आसानी से मिलती हैं। 2018 के एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि शब्दों ने अपना बहुत सारा वज़न खो दिया है और हमें अपनी भाषा को जीवित रखना चाहिए।
आज़माइए: शीर्षक Το χρώμα του φεγγαριού लीजिए और το χρώμα του… या το χρώμα της… (…का रंग) से अपनी तीन मौलिक टिप्पणियाँ लिखिए, जैसे το χρώμα της σιωπής (मौन का रंग)। फिर एक यूनानी वाक्य में समझाइए कि वे συγγραφέας (लेखिका) की जगह μαστόρισσα (कारीगरिन) क्यों पसंद करती हैं।
क्या आप जानते हैं?
- उनकी पहली पांडुलिपि 'लाल घर' ने उन्हें नौकरी दिलाई: आलोचक तासोस वूर्नास की समीक्षा के बाद अख़बार अव्यी ने उन्हें रख लिया।
- पेरिस में पढ़ने की उनकी योजना विफल हो गई: अव्यी के लिए लिखने के कारण पुलिस के पास उनकी फ़ाइल थी और उन्हें पासपोर्ट नहीं दिया गया।
- खानिया के फ़्रांसीसी स्कूल में वे ऐसी विरली छात्रावासी थीं जो घर लौटने का समय आने पर ख़ुश नहीं, उदास हो जाती थीं।
- वे अपनी पांडुलिपियाँ हाथ से लिखती हैं।
प्रमुख कृतियाँ
| यूनानी शीर्षक | शीर्षक | वर्ष |
|---|---|---|
| Το κόκκινο σπίτι | लाल घर — आत्मकथात्मक पहली किताब | 1988 |
| Η μπόρα | मूसलाधार — उपन्यास | 1989 |
| Το χρώμα του φεγγαριού | चाँद का रंग — उपन्यास | early 1990s |
| Οι κάργιες | कौवे — उपन्यास | 1997 |
| Θα ξανάρθουν τα χελιδόνια | अबाबीलें लौटेंगी — उपन्यास | 2015 |
| Το χαμόγελο του δράκου | ड्रैगन की मुस्कान — उपन्यास | 2018 |
याद रखने लायक एक पंक्ति
Πάντα θεωρούσα τον εαυτό μου μαστόρισσα της λογοτεχνίας και ποτέ συγγραφέα.
Pánta theoroúsa ton eaftó mou mastórissa tis logotechnías ke poté syngraféa.
मैंने हमेशा ख़ुद को साहित्य की कारीगरिन माना, कभी लेखिका नहीं।











































