जीवन
कराइस्काकिस का जन्म लगभग 1782 में पश्चिमी थेसाली के अग्राफ़ा पहाड़ों में मावरोम्माती गाँव के पास हुआ। उनके जीवनकाल में ही सुनाई जाने वाली कहानी के अनुसार उनकी माँ एक नन थीं और पिता एक क्लेफ़्ट, यानी पहाड़ों का एक बाग़ी; इसीलिए उनके दुश्मन (और कभी-कभी दोस्त भी) उन्हें «ο γιος της καλογριάς» (नन का बेटा) कहते थे। वे ग़रीबी में पले, जवानी में ही पहाड़ों में चले गए और कई क्लेफ़्टों की तरह कुछ समय तक एपिरस के उस्मानी शासक, इओआन्निना के अली पाशा के अंगरक्षक दल में रहे, जहाँ उन्होंने युद्ध और राजनीति कठिन अनुभवों से सीखी।
1821 में जब क्रांति छिड़ी, तो वे पश्चिमी मध्य यूनान में आर्माटोलोस, यानी एक सशस्त्र दल के कप्तान के रूप में लड़े। वे बहादुर और चतुर थे, पर घमंडी और कठिन स्वभाव के भी; 1824 में मेसोलोंगी की एक यूनानी सभा ने उन्हें ग़द्दार तक घोषित कर दिया, हालाँकि जल्द ही उन्हें फिर से सेवा में ले लिया गया। वे बरसों तक तपेदिक और बुख़ार से पीड़ित रहे, और सबसे बुरे क्षणों में भी अपनी रंगीन गालियों और चुटकुलों के लिए मशहूर थे।
1826 में, जब क्रांति टूटने के कगार पर थी, सरकार ने उन्हें रूमेली का प्रधान सेनापति (αρχιστράτηγος) बनाया। उन्होंने एक के बाद एक जीतें हासिल कीं, एथेंस के पास ख़ाइदारी में और सबसे बढ़कर नवंबर 1826 में अराख़ोवा में, और फिर अक्रोपोलिस की उस्मानी घेराबंदी तोड़ने के लिए अपनी सेना फ़ालिरो में इकट्ठा की। 22 अप्रैल 1827 को एक झड़प में उन्हें गोली लगी और वे घातक रूप से घायल हो गए; अगले दिन, 23 अप्रैल को, संत जॉर्ज के पर्व पर, जो उनका नाम-दिवस था, उनकी मृत्यु हो गई।
कृतियाँ

कराइस्काकिस ने किताबें नहीं लिखीं; उनका काम एक सैन्य अभियान था। 1826 की गर्मियों में रेशिद मेहमेद पाशा (कियूताख़िस) की उस्मानी सेना एथेंस के अक्रोपोलिस को घेरे हुए थी, और मध्य यूनान का अधिकांश भाग फिर से उस्मानी नियंत्रण में आ चुका था। कराइस्काकिस समझ गए कि वे विशाल उस्मानी सेना को खुले मैदान में नहीं हरा सकते, इसलिए उन्होंने क्लेफ़्टों की रणनीति अपनाई: वे पहाड़ों में तेज़ी से आगे बढ़ते, रसद की आपूर्ति काटते और अलग-थलग टुकड़ियों पर हमला करते।
उनकी सबसे बड़ी सफलता नवंबर 1826 में पार्नासस पर्वत की ढलानों पर अराख़ोवा में मिली। उन्होंने मुस्तफ़ा बे के नेतृत्व वाली एक उस्मानी टुकड़ी को गाँव में घेर लिया और बर्फ़ में कई दिनों की लड़ाई के बाद उसे नष्ट कर दिया; इस जीत ने पूरे रूमेली में यूनानियों का मनोबल लौटा दिया और अराख़ोवा में आज भी हर साल इसका उत्सव मनाया जाता है। अगले हफ़्तों में उनके सैनिकों ने क्षेत्र का बड़ा हिस्सा वापस ले लिया, दिस्तोमो के आसपास और अन्य जगहों पर लड़ाइयाँ हुईं।
1827 की शुरुआत में वे अक्रोपोलिस को मुक्त कराने के लिए अपनी सेना को तट पर फ़ालिरो और पिरेयस ले आए, और उन विदेशी अफ़सरों के साथ असहज ढंग से काम किया जो अब यूनानी सेनाओं की कमान सँभाल रहे थे, लॉर्ड कोक्रेन और जनरल रिचर्ड चर्च। अप्रैल 1827 में उनकी मृत्यु ने सेना को ऐसे नेता के बिना छोड़ दिया जिस पर सैनिक भरोसा करते थे; कुछ दिन बाद एक ख़राब योजना वाला हमला विफल हुआ और जून में अक्रोपोलिस ने आत्मसमर्पण कर दिया। तब से बहुत से यूनानी मानते हैं कि अगर कराइस्काकिस जीवित रहते, तो कहानी कुछ और होती। उनका हास्य, उनका ग़ुस्सा और अपने सैनिकों के प्रति उनकी वफ़ादारी माक्रियान्निस जैसे योद्धाओं के संस्मरणों से जानी जाती है।
आज के यूनान में विरासत
हर यूनानी यह नाम पिरेयस के नेओ फ़ालिरो में स्थित Γήπεδο Γεώργιος Καραϊσκάκης (कराइस्काकिस स्टेडियम) से जानता है, जो ओलिंपियाकोस का घरेलू मैदान है और उसी तट के पास बना है जहाँ वे घायल हुए थे। एथेंस और कई शहरों में कराइस्काकिस चौक हैं, हर जगह Καραϊσκάκη नाम की सड़कें हैं, और अराख़ोवा में एक स्मारक है जहाँ हर साल 1826 की जीत को याद किया जाता है। सफ़ेद फ़ुस्तानेला और क्लेफ़्टों जैसे लंबे बालों वाला उनका चित्र 1821 पर स्कूली इतिहास की किताबों में छपता है, और रूमेली के लोकगीत उनकी मृत्यु का गान करते हैं। अगर आप मैच के दिन पिरेयस जाएँ, तो हज़ारों लोगों को उनका नाम पुकारते सुनेंगे।
क्या आप जानते हैं?
- उनकी मृत्यु 23 अप्रैल 1827 को संत जॉर्ज के पर्व पर हुई, जो उनका नाम-दिवस था।
- उनका उपनाम «ο γιος της καλογριάς» (नन का बेटा) इस कहानी से आया कि उनकी माँ एक नन थीं।
- युद्ध के अधिकांश समय वे तपेदिक से बीमार रहे, फिर भी अपने सैनिकों का नेतृत्व आगे रहकर करते रहे।
- 1824 में उनके अपने ही पक्ष ने उन्हें ग़द्दार ठहराया; दो साल बाद उसी सरकार ने उन्हें प्रधान सेनापति बनाया।
प्रमुख कृतियाँ
| यूनानी शीर्षक | शीर्षक | वर्ष |
|---|---|---|
| Μάχη του Χαϊδαρίου | ख़ाइदारी की लड़ाई | 1826 |
| Αρχιστράτηγος της Ρούμελης | रूमेली के प्रधान सेनापति | 1826 |
| Μάχη της Αράχωβας | अराख़ोवा की लड़ाई | 1826 |
| Εκστρατεία στη Ρούμελη | मध्य यूनान में अभियान | 1826–1827 |
| Μάχη του Φαλήρου | फ़ालिरो की लड़ाई, जहाँ वे वीरगति को प्राप्त हुए | 1827 |
कृतियों से




विकिमीडिया कॉमन्स से सार्वजनिक डोमेन की तस्वीरें।
याद रखने लायक एक पंक्ति
Εγώ πεθαίνω· εσείς όμως να είστε μονιασμένοι και να βαστάξετε την πατρίδα.
Ego pethaino; eseis omos na eiste moniasmenoi kai na vastaxete tin patrida.
मैं मर रहा हूँ; पर तुम सब एकजुट रहना और हमारी मातृभूमि को थामे रखना।


























