जीवन
दियाकोस का जन्म लगभग 1788 में डेल्फ़ी के उत्तर में फ़ोकिस और डोरिस के पहाड़ों में हुआ; दो गाँव, आर्तोतीना और आनो मूसूनित्सा, उन्हें अपना बताते हैं, और दूसरे गाँव का नाम बाद में उनके सम्मान में «Αθανάσιος Διάκος» रख दिया गया। उनका पारिवारिक नाम आमतौर पर मस्साबेतास या ग्रामातिकोस बताया जाता है। बचपन में वे एक मठ में गए और डीकन बने, यूनानी में διάκος, और यही उपाधि उनका उपनाम बन गई। परंपरा के अनुसार एक उस्मानी अधिकारी से झगड़े के बाद उन्होंने मठ छोड़ दिया और पहाड़ों में चले गए, जहाँ वे क्लेफ़्टों में शामिल हुए और बाद में ओदिस्सेयस आंद्रूत्सोस के दल में आर्माटोलोस, यानी उस्मानी अधिकार के अधीन एक सशस्त्र रक्षक, के रूप में सेवा की।
1821 के वसंत में जब क्रांति छिड़ी, दियाकोस ने लिवादिया क्षेत्र में अपने लोगों को खड़ा किया। अप्रैल के अंत में ओमेर व्रियोनी और कोसे मेहमेद के नेतृत्व में एक उस्मानी सेना पेलोपोनीज़ की ओर दक्षिण बढ़ी, और यूनानियों ने थर्मोपिली के प्राचीन दर्रे के पास स्पेर्ख़ियोस नदी पर उसे रोकने की कोशिश की। दियाकोस ने कुछ सौ लोगों के साथ अलामाना का पुल थामे रखा। बाक़ी अधिकांश यूनानी दल पीछे हट गए; वे डटे रहे। घंटों की लड़ाई के बाद, घायल और टूटी तलवार के साथ, उन्हें बंदी बना लिया गया। लामिया में उन्हें जान बख़्शने का प्रस्ताव दिया गया, बशर्ते वे अपना धर्म बदलें और उस्मानियों की सेवा करें। उन्होंने इनकार कर दिया, और 24 अप्रैल 1821 को उन्हें मृत्युदंड दिया गया, परंपरा के अनुसार सूली पर चढ़ाकर या सीख़ पर भूनकर। उनकी उम्र लगभग तैंतीस वर्ष थी।
कृतियाँ

दियाकोस ने किताबें नहीं लिखीं; उनका काम एक लड़ाई और एक मृत्यु है, और वह ढंग जिससे यूनानी तब से उन्हें सुनाते आए हैं। सैन्य दृष्टि से अलामाना की लड़ाई एक हार थी: उस्मानी सेना स्पेर्ख़ियोस पार करके दक्षिण की ओर बढ़ गई। लेकिन यह मार्च 1821 के पहले विद्रोहों के कुछ ही हफ़्ते बाद हुई, जब कोई नहीं जानता था कि क्रांति बचेगी या नहीं, और थर्मोपिली में, लियोनिडास और तीन सौ के स्थान पर, डटे रहने वाले एक व्यक्ति की कहानी ने विद्रोह को उसके बिल्कुल पहले दिनों से ही एक नायक दे दिया। कुछ ही महीनों में उनकी मृत्यु की ख़बर गाँव-गाँव फैल गई, और यूनानी उन्हें एक नए लियोनिडास की तरह याद करने लगे।
लोक-परंपरा ने उन्हें उनके शब्द दिए। उन पर बने सबसे प्रसिद्ध κλέφτικο τραγούδι (क्लेफ़्ट गीत) में दियाकोस को वसंत की एक सुबह मौत की ओर ले जाया जाता है और वे चारों ओर फूलों से लदी डालियों और नई घास को देखते हैं। गीत उनसे कहलवाता है कि मृत्यु ने कितना बुरा समय चुना है: «Για δες καιρό που διάλεξε ο Χάρος να με πάρει»। परंपरा उनके मुँह में एक और पंक्ति रखती है, जो धर्म बदलने के प्रस्ताव पर उनका उत्तर है: «Γραικός γεννήθηκα, Γραικός θε να πεθάνω» (यूनानी पैदा हुआ, यूनानी ही मरूँगा)। 1867 में कवि अरिस्तोतेलिस वालाओरितिस ने एक लंबी कविता Αθανάσιος Διάκος लिखी, और 19वीं सदी के चित्रकारों ने उन्हें टूटी तलवार के साथ पुल पर दिखाया। लड़ाई से भी ज़्यादा इन्हीं छवियों ने दियाकोस को राष्ट्रीय प्रतीक बनाया।
आज के यूनान में विरासत
लामिया में दियाकोस की एक प्रतिमा उस जगह के पास खड़ी है जहाँ उन्हें मृत्युदंड दिया गया था, और शहर हर अप्रैल उनकी पुण्यतिथि के आसपास उन्हें याद करता है। फ़ोकिस में उनका जन्मस्थान उनके नाम पर है, और Αθανασίου Διάκου या केवल Διάκου नाम की सड़कें और चौक लगभग हर यूनानी शहर में हैं, जिनमें एथेंस में अक्रोपोलिस के पास की एक जानी-मानी सड़क भी शामिल है। यूनानी बच्चे स्कूल में 25 मार्च, राष्ट्रीय दिवस, के आसपास उनसे मिलते हैं, जब वे उनकी आख़िरी सुबह का लोकगीत और अलामाना की कहानी पढ़ते हैं। एक अच्छा सुझाव: लोकगीत «Του Διάκου» खोजिए और उसकी पहली दो पंक्तियाँ पढ़िए, जिन्हें एक शुरुआती विद्यार्थी भी शब्द-दर-शब्द समझ सकता है। अगर आप एथेंस से लामिया की पुरानी राष्ट्रीय सड़क पर गाड़ी चलाएँ, तो आप स्पेर्ख़ियोस घाटी से गुज़रते हैं जहाँ यह लड़ाई हुई थी।
क्या आप जानते हैं?
- Διάκος कोई पारिवारिक नाम नहीं बल्कि एक धार्मिक उपाधि है: योद्धा बनने से पहले वे एक मठ में डीकन थे।
- अलामाना का पुल थर्मोपिली से कुछ ही किलोमीटर दूर है, इसीलिए यूनानियों ने उनकी तुलना लियोनिडास से की।
- फ़ोकिस में उनके पैतृक गाँव का नाम उनके नाम पर अथानासियोस दियाकोस रखा गया।
- उनकी मृत्यु 24 अप्रैल 1821 को हुई, क्रांति शुरू होने के मुश्किल से एक महीने बाद।
प्रमुख कृतियाँ
| यूनानी शीर्षक | शीर्षक | वर्ष |
|---|---|---|
| Μοναχός και διάκος | फ़ोकिस के एक मठ में भिक्षु और डीकन | c. 1800s |
| Αρματολός με τον Οδυσσέα Ανδρούτσο | ओदिस्सेयस आंद्रूत्सोस के दल में आर्माटोलोस | c. 1810s |
| Η μάχη της Αλαμάνας | अलामाना के पुल की लड़ाई | 1821 |
| Ο θάνατος στη Λαμία | लामिया में उनका मृत्युदंड | 1821 |
कृतियों से




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याद रखने लायक एक पंक्ति
Για δες καιρό που διάλεξε ο Χάρος να με πάρει, / τώρα π' ανθίζουν τα κλαδιά και βγάζει η γη χορτάρι
Gia des kairo pou dialexe o Charos na me parei, / tora p' anthizoun ta kladia kai vgazei i gi chortari
देखो, मृत्यु ने मुझे ले जाने के लिए कैसा समय चुना है, / अभी, जब डालियाँ खिल रही हैं और धरती घास उगा रही है।


























